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सियासत के गलियारों में कहा जाता है कि यहां कुछ भी स्थायी नहीं होता, ना दोस्ती और ना ही दुश्मनी। यहां तो मुद्दे भी स्थायी नहीं होते, वक्त के साथ उन्हें गढ़ा जाता है और जरूरत के मुताबिक फिर निकाल लिया जाता है। इसकी ताज़ा मिसाल समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के दरमियान बनी नई दोस्ती है। भले ही ये दोनों पार्टियां अब एक दूसरे के साथ हैं, लेकिन इन दोनों के बीच खटास का भी एक लंबा इतिहास रहा है।

कई बार मुलायम ने कांग्रेस का हाथ थामा, तो कई बार उसे छोड़ भी दिया। दोनों की इस दोस्ती का आगाज 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से हुआ। उस वक्त मुलायम सिंह यादव मुसलमानों के लिए कांग्रेस के समर्थन से एक अभियान चला रहे थे। कयास लगाए गए थे कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन होगा, लेकिन अपने धोबी पछाड़ के लिए मशहूर मुलायम ने कांग्रेस को पटखनी दे दी।

कहा जाता है कि मुलायम ने सुबह 4.30 बजे तत्कालीन राज्यपाल सत्य नारायण रेड्डी को फोन कर विधानसभा भंग करने के लिए कहा था। कांग्रेस और सपा के बीच कभी खुशी और कभी गम का माहौल तभी से चला आ रहा है। कभी मुलायम ने कांग्रेस पर सीबीआई का उनके खिलाफ गलत इस्तेमाल करने का आरोप लगाया, तो 1999 को कौन भूल सकता है, जब कांग्रेस ने सोनिया गांधी को सत्ता तक पहुंचने से रोकने का समाजवादी पार्टी पर आरोप लगाया था। लेकिन इस बार हालात बदले-बदले से नज़र आते हैं।

दोनों ही पार्टियों के नई पीढ़ी के सियासतदां मैदान में हैं। अगर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के दरमियान इस ताज़ा गठबंधन पर नजर डाली जाए तो आंकड़े यही बताते हैं कि टीम अखिलेश और टीम राहुल अगर जमीनी स्तर पर इस गठबंधन के मुताबिक वोट हासिल करने में कामयाब रहे तो उत्तर प्रदेश विधानसभा के नतीजे बेहद चौंकाने वाले साबित हो सकते हैं। अखिलेश और राहुल ने ये फैसला महज ऐसे ही नहीं ले लिया है। इसके पीछे एक गहरी सोच है। दरअसल समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन से प्रदेश की कई सीटों पर मामला हार से जीत में बदल सकता है।

अखिलेश ने 2012 में अकेले ही पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। प्रदेश में 29.15 प्रतिशत वोट समाजवादी पार्टी को मिले और कांग्रेस सूबे में चौथे नंबर पर रही। जिसे  11.63 प्रतिशत वोट मिले। दोनों के वोट जोड़ दिए जाएं तो ये आंकड़ा 40.78 प्रतिशत होता है। ये अपने आप में एक जादुई आंकड़ा है, क्योंकि यूपी की राजनीति में महज 25 से 30 प्रतिशत वोट हासिल करने वाली पार्टी सरकार बनाती आई हैं। लेकिन, तस्वीर के कई और पहलू भी हैं, क्या समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के पास 2012 वाली चमक बरकरार है। क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में सत्ता विरोधी लहर लगभग हर चुनाव में देखने को मिलती है। साथ ही जमीनी स्तर पर ये गठबंधन वोटों को भी जोड़ पाएगा ये भी एक बड़ा सवाल है। क्या मुस्लिम वोट एकजुट होकर सपा-कांग्रेस गठबंधन की तरफ जाएंगे या फिर बीएसपी उन्हें अपनी तरफ खींचने में कामयाब रहेगी? 

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन में टीम अखिलेश और टीम राहुल के सामने बड़ी चुनौती वोटों को एकजुट करने की भी है और अगर ये कामयाब रहे तो नतीजे वाकई चौंकाने वाले रहेंगे।

BY- अमन अहमद

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