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दिक्कत से दिक्कत या दिक्कत सियासी है !

नोटबंदी से फिलहाल दिक्कत आम को भी और खास को भी दिक्कत तो है । और सबसे ज्यादा दिक्कत हो रही है सड़क से संसद तक नोटबंदी पर सवाल उठा रही पॉलिटिकल पार्टियों को । जो विरोध के लिए हवाला दे रहीं हैं लोगों को हो रहीं दिक्कतों का । तो क्या दिक्कत से दिक्कत है या दिक्कत की वजह कुछ और है ? ये समझने की जरुरत है । असल में आम लोगों की दिक्कतों का हवाला देकर विरोध करने वाली पॉलिटिकल पार्टी ये बताएं कि आम लोग क्या आज दिक्कत में हैं ? आम और गरीब क्या आज लाइन में लगे हैं ? राशन से लेकर अस्पताल, अस्पताल से लेकर सरकारी कार्यालय तक कभी देखा है बदहाल व्यवस्था से जूझते गरीब को ? यहां तक कि पूरे दिन मेहनत-मजदूरी करने वाले मजदूर को तो उसकी मजदूरी भी लाइन में ही लगकर मिलती है । जिसकी ये गैरंटी भी नहीं कि मिलेगी भी कि नहीं । ना जाने कितने लोग सरकारी अस्पताल में बिना इलाज के दम तोड़ देते हैं । कभी देखा है जब गरीब को रिश्वत ना देने पर सरकारी अस्पताल से धक्के मारकर निकाल दिया जाता है । तो वहीं निजी अस्पताल बिना पैसे दिए इलाज करने से इंकार कर देते हैं । कई तो इसलिए जान गंवा देते हैं क्योंकि अस्पताल में डॉक्टर ही नहीं है । कभी देखा है किसी पीड़ित को जो थाने के चक्कर काट-काटकर थक जाता है मगर बिना पैसे दिए इंसाफ तो दूर पुलिस सुनती भी नहीं औऱ वो इसलिए आत्महत्या कर लेता है । कभी गौर किया है जब एक गरीब की बेटी दहेज ना देने पर जला दी जाती है । देश में ना कितने ही गरीब बिन पैसे भूखे पेट सो जाते हैं । क्या कभी उनका दर्द समझने की कोशिश की किसी ने ? कभी सोचा है उन युवाओं के बारे में जो पढ़-लिखकर भी बेरोजगार है । नौकरी नहीं तो पैसे कहां से ? नौकरी के लिए भी तो रिश्वत ही चलती है । बिन मुआवजे के किसान आत्महत्या कर लेता है । बिन पैसे सब सून । फिर दिक्कत आज ही क्यों ? ये सोचने का विषय है कि विरोध की असल वजह है क्या ?  यूपी सरकार ने एलान किया कि कुछ दिन के लिए पुराने नोट रजिस्ट्री में स्वीकार्य होंगे । अब सोचिए क्या गरीब आदमी प्रोपर्टी खरीदेगा ? पहले वो पेट तो भर ले । प्रोपर्टी लेने-बेचने की उसकी हैसियत होती तो वो गरीब नहीं होता । तो सोचिए ये फैसला किनके लिए ? हां अगर राहत देनी ही है तो कुछ ऐसा कीजिए सरकार कि गरीब अपने पुराने नोट भी चला लें और अपना काम धंधा छोड़कर लम्बी लाइनों में भी ना लगना पड़े । यूपी के ही आजमगढ़ में कुछ बच्चों ने अपनी गुल्लक तोड़कर खुले पैसे के जरिए लोगों की मदद के लिए सरकारी अस्पताल में स्टॉल लगाए और काफी लोगों की मदद भी की । कुछ ऐसा ही कर देते । और कुछ नहीं तो सख्त निर्देश अस्पतालों को ही दे दिए जाते कि नोटबंदी की वजह से किसी का इलाज ना रुके । तो क्या ये अस्पताल इलाज के लिए इंकार कर देते ? जहां पुराने नोटों की स्वीकार्यता के सख्त आदेश हैं कम से कम वहां तो ये नोट स्वाकार्य हों  ये प्रतिबद्धता ही दिखा देते । तो क्या जनता यूं परेशान होती ! ये सवाल उन सभी राजनीतिक दलों से । जिनकी कहीं ना कहीं राज्य में अपनी सरकार है । क्या विरोध करने भर से जिम्मेदारी पूरी हो जाती है ? वाकई चिंता है तो सवाल के बजाए समाधान ढूंढिए । माना फैसला केंद्र सरकार का है मगर प्रदेश में तो सरकार आप भी हैं । जनता के प्रति जिम्मेदारी तो आपकी भी है । जनादेश तो आपको भी मिला । फिर कोशिश आपकी की तरफ से क्यों नहीं ? इसलिए ये सवाल कि दिक्कत के लिए दिक्कत है या दिक्कत सियासी है ? 

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