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देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को अब देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में पी.के ( पीके वाले आमिर खान की नहीं मोदी और नीतीश वाले प्रशांत किशोर )  की जरूरत पड़ गई है । पार्टी को अब इस पीके पर इतना ज्यादा भरोसा हो गया है कि कांग्रेस ने यूपी के साथ साथ पंजाब को जिताने का ठेका भी पीके को ही दे दिया है । हांलाकि पीके को उनकी हद भी बता दी गई है ( इसका जिक्र इसी लेख में सबसे नीचे है ) । हालांकि यहां यह सवाल जरूर दिमाग में कौंधता है कि जिस उत्तर प्रदेश से कांग्रेस और कांग्रेस के नेहरू-गांधी परिवार को हमेशा से ताकत मिलती रही है , उसी प्रदेश ने कांग्रेस को इतनी बुरी तरह से नकार क्यों दिया? इसका उत्तर जाने बिना पीके कांग्रेस को उसके बीते हुए दिन लौटा पायेंगे ,ऐसा मुमकिन नहीं लगता ।

दरअसल, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के बुरे दिनों की शुरूआत 80 के दशक से ही हो गई थी। 1980-85 के महज 5 साल के कार्यकाल में जहां कांग्रेस एक के बाद एक अपने मुख्यमंत्री बदलने में लगी हुई थी ( वी. पी . सिंह , श्रीपति मिश्रा , एन डी तिवारी ) वहीं प्रदेश में मुलायम सिंह यादव नाम के एक पहलवान नेता का राजनीति में उदय हो रहा था जिसे एक तरफ चौ. चरण सिंह का आशीर्वाद हासिल था। वहीं दूसरी तरफ पूर्व युवा कांग्रेसी तुर्क चन्द्रशेखर का स्नेह भी प्राप्त था। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या ने कांग्रेस के वनवास को 5 साल के लिए और टाल दिया लेकिन कुछ ही सालों बाद हालात बदल गये । केन्द्र में बीजेपी और लेफ्ट के सहयोग से वी.पी सिंह देश के प्रधानमंत्री बने। इस समय मुलायम सिंह यादव ने बड़ी तेजी से पाला बदला और अपने गुरू चन्द्रशेखर का साथ छोड़ कर पूरी तरह से वी.पी सिंह को प्रधानमंत्री पद पाने में सहयोग दिया क्योंकि मुलायम यह बात अच्छी तरह से जानते थे कि आगे चलकर उन्हें यूपी का मुख्यमंत्री बनने के लिए वी.पी सिंह के मदद की जरूरत पड़ेगी क्योंकि यूपी में जीते विधायकों में से बड़ी तादाद वी.पी सिंह के समर्थकों की होगी । जनता दल के यूपी प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर 1989 के विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह अपने दम पर प्रदेश में 208 सीटें जितवा कर लाये और जब वो यह मान कर चल रहे थे कि वी.पी सिंह के सहयोग से आसानी से मुख्यमंत्री बन जायेंगे...वी पी सिंह ने खेल कर दिया । उन्होंने विदेश से पढ़ाई करके लौटे पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव चौ. अजीत सिंह को सीएम पद पर दावा ठोंकने के लिए दिल्ली से लखनऊ भेज दिया । टकराव बढ़ता गया और आखिरकार यह फैसला किया गया कि विधायकों से चुनाव करवा लिया जाये। मुफ्ती मोहम्मद सईद , चिमनभाई पटेल और मधु दंडवते को आलाकमान की तऱफ से लखनऊ भेजा गया। राजनीतिक कलाकारी के जरिये डी पी यादव की सहायता से मुलायम सिंह ने अजीत सिंह के गढ़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश से उनके समर्थक विधायकों को तोड़ा और बड़ी मुश्किल से महज 4 वोटों से अजीत सिंह को हराकर वो प्रदेश में पहली बार मुख्यमंत्री बने और उसी समय यह लगने लगा था कि अब कांग्रेस को एक बड़े वनवास के लिए तैयार हो जाना चाहिए । केन्द्र में वी पी सिंह की सरकार को चलाने वाली बीजेपी को उस समय यह लग गया था कि अगर पार्टी को बड़ा करना है तो अयोध्या विवाद को और ज्यादा गर्माना होगा। मुलायम सिंह को भी बीजेपी का यह खेल रास आने लगा । धीरे धीरे मुलायम धर्मनिरपेक्षता की राजनीति के बड़े प्रतीक के रूप में उभरने लगे । यह बात वी.पी सिंह को हजम नहीं हो रही थी । 1990 में तत्कालीन मद्रास में हुई राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में राजीव गांधी , ज्योति बसु , इंद्रजीत गुप्ता यहां तक कि कांशीराम ने भी बीजेपी के राम मंदिर आंदोलन के खिलाफ मुलायम के रूख की तारीफ की और उस बैठक में तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी सिंह अलग थलग पड़ते नजर आये। वहां से भनभनाते हुए वी.पी सिंह दिल्ली आये...इधर आडवाणी ने रथ यात्रा शुरू की..। तब तक मुलायम सिंह मुल्ला मुलायम के नाम से भी जाने लग गये थे । मुलायम से पहले से ही चिढ़े बैठे वी.पी सिंह ने लालू यादव को कहा कि वो आडवाणी को गिरफ्तार कर ले ताकि धर्मनिरपेक्षता के मामले में लालू मुलायम से आगे निकल जाये । लालू ने ऐसा ही किया । अब मुलायम को कुछ ऐसा करना था जिससे मुसलमान एक बार फिर से उन्हे अपना एकमात्र रहनुमा मानने लग जाये और उन्होंने कार सेवकों पर गोली चलवा कर दोबारा से यह तमगा हासिल कर लिया। राजनीति अब तेजी से बदलने लगी । बीजेपी ने वी.पी सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया । चन्द्रशेखर कांग्रेस के सहयोग से पीएम बन गये। उधर अपनी सरकार गिरने से बौखलाये वी पी सिंह ने अपने लगभग 98 समर्थक विधायकों को मुलायम से समर्थन वापस लेने को कहा । अजीत सिंह और जॉर्ज फ़र्नान्डिस जैसे नेताओं को यह जिम्मेदारी दी गई कि वो मुलायम को किसी भी तरह से मुख्यमंत्री पद से हटा दे।

यहीं पर कांग्रेसे के सामने दोराहे की स्थिति आ गई । 94 विधायकों के साथ कांग्रेस उस समय मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभा रहा था। मुलायम ने सरकार बचाने के लिए कांग्रेस से सहयोग मांगा। कांग्रेस की तरफ से सीताराम केसरी को पर्यवेक्षक बना कर लखनऊ भेजा गया और यहीं पर कांग्रेस ने प्रदेश में अपने ताबूत में आखिरी कील ठोंक दी । प्रदेश कांग्रेस का हर बड़ा नेता चाहता था कि कांग्रेस मुलायम को समर्थन ना दे लेकिन उस समय यूपी कांग्रेस में अधिकतर नेता ऊंची जाति के थे जो सीताराम केसरी को पसंद नहीं थे । सीताराम को लगा कि मुलायम को समर्थन देकर पहले इन ऊंची जाति के कांग्रेसी नेताओं को निपटा देते है फिर प्रदेश में पिछड़ी और दलित जाति के नेता कांग्रेस में उभरेंगे । आलाकमान ने भी सीताराम की सिफारिश को माना और नतीजा ऊंची जाति के नेताओं को निपटाने के चक्कर में कांग्रेस ही निपट गई । हिंदू ( यादव को छोड़कर ) तो बीजेपी के साथ चले गये और मुसलमानों ने मुलायम का दामन थाम लिया । कांग्रेस की हालत ना माया मिली ना राम ।

उस समय कांग्रेस की आपसी गुटबाजी का आलम यह था कि जब कांग्रेस ने मुलायम सरकार से समर्थन वापसी का फैसला किया ठीक उसी समय कांग्रेस के एक दूसरे धड़े ने मुलायम को यह जानकारी लीक कर दी। नतीजा मुलायम सुबह का उजाला निकलने से पहले ही राज्यपाल के पास पहुंच चुके थे । सामने वाले को अपना बना लेने में माहिर मुलायम उस समय के राज्यपाल सत्यनारायण रेड्डी को भी अपना दोस्त बना चुके थे और माननीय राज्यपाल ने मुलायम के सुझाव को मानने में एक सेंकड की भी देर नहीं की । जिस समय नारायण दत्त तिवारी कांग्रेस का समर्थन वापसी का पत्र लेकर राजभवन पहुंचे , राज्यपाल विधानसभा भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा चुके थे और मुलायम को चुनाव होने तक कार्यवाहक मुख्यमंत्री का पद संभालने को भी कह दिया गया था।

रही सही कसर सीताराम केसरी ने 1996 में पूरी कर दी जब कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उन्होंने यूपी में बसपा से गठबंधन कर महज 126 सीटों पर लड़ने का फैसला किया और 300 के लगभग सीटें बसपा की झोली में डाल दी । उस दिन के बाद से कांग्रेस आज तक यूपी में उठ नहीं पाई है । हां , उसके नरेश अग्रवाल और जगदम्बिका पाल जैसे नेता जरूर कांग्रेस के सिंबल पर चुनाव जीत कर कभी मुलायम तो कभी बीजेपी की सरकार बनवाने में मददगार साबित होते रहे । हालत यह है कि आज कांग्रेस पार्टी के पास प्रदेश में कोई बड़ा दलित या पिछड़ा तो छोड़िये ब्राहम्ण नेता भी नहीं बचा है । वही अपर कास्ट जिसे लुभाकर कभी कल्याण सिंह ने पूर्ण बहुमत हासिल किया तो कभी मायावती ने तो कभी अखिलेश यादव ने । यही पीके के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। 

अंत में सबसे खास....कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस ही है । अब जरा खेल देखिये कि जिस प्रशांत किशोर को कांग्रेस के युवराज बड़ी उम्मीदों से अपने साथ लेकर आये उन्हीं के हाथ बांध दिये गये है । मोदी और नीतीश के साथ काम करते हुए जो पी के सर्वेसर्वा थे और सीधे आलाकमान को रिपोर्ट करते थे उन्हें कहा गया है कि वो राहुल गांधी की बजाय यूपी और पंजाब के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को रिपोर्ट करे। सबसे गजब तो यह है कि पी के को उनकी मनमाफिक जगह भी नहीं दी जा रही है । उन्होंने कांग्रेस के वॉर रूम या कांग्रेस के मुख्यालय में अपने कार्यालय के लिए जगह मांगी थी लेकिन कांग्रेस ने उनकी इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया। अब ऐसे में इस लुंज-पुंज हालत में पीके कांग्रेस को कैसी जीत दिलवा पायेंगे कहना मुश्किल है ..इससे भी बड़ा सवाल यह ही कि सीधे आलाकमान से बात करने के आदि हो चुके पीके आखिर कब तक इस व्यवस्था में काम कर पायेंगे क्योंकि अब तो उनके लिए कई दलों के दरवाजे खुले है ।

लेखक- संतोष पाठक, डिप्टी ब्यूरो चीफ, दिल्ली (समाचार प्लस)

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