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उत्तर प्रदेश में पहले चरण के मतदान में अब कुछ ही दिन बचे हैं । 11 फरवरी को उत्तर प्रदेश के 15 जीलों की 73 सीटों पर मतदान होना है । मतलब चुनाव अब सर पर है और उत्तर प्रदेश में सियासत का पारा पूरी तरह गर्म है । चुनाव की तारीख नजदीक आते ही सियासी दलों के नुमाइंदों ने भी अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया हैं । कल तक विकास वाली सियासत करने का दावा करने वाले सभी दल उसे भूल गए हैं । बीजेपी एक बार फिर राम मंदिर और तीन तलाक जैसे मुद्दों के साथ अपने हिंदूवादी एजेंडे की तरफ लौट गई है । तो दलितों की राजनीति करने वालीं मायावती खुलेआम मुसलमानों से उनके लिए वोट करने की अपील कर रही हैं । उधर अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी भी मुसलमानों पर अपना हक जताने में लगी है । मतलब साफ है सियासत अब पूरी तरह से वोटों के ध्रुवीकरण के लिए की जा रही है । बीजेपी की तरफ से नेताओं का एक बड़ा तब्का हिंदुत्व वाली बयानबाजी कर रहा है । तो समाजवादी पार्टी की तरफ से ये जिम्मेदारी पार्टी का मुस्लिम चेहरा आजम खान को सौंपी गई है ।

मुस्लिम वोटों पर है नजर

एक वीडियों के जरिये मायावती अल्पसंख्यक समाज के लोगों को अपना वोट खराब ना करने की सलाह दे रही हैं । तो आजम खान मायावती के 10 साल पुराने एक बयान को खूब उछाल रहे हैं । मतलब सारी लड़ाई अब मुस्लिम वोटों के लिए की जा रही हैं । और हो भी क्यों ना ? उत्तर प्रदेश में कुल 20 फीसदी मुस्लिम वोट हैं । और इस बार ये मुस्लिम वोट किस तरफ जाएंगे, इस पर हर पार्टी की नजर है. अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी यादव मुस्लिम समीकरण को सत्ता की चाभी मानती है । तो मायावती दलित-मुस्लिम वोटों के बल पर दोबारा यूपी की गद्दी पाने की जुगत में लगी हुई हैं ।



यूपी में क्यों अहम हैं मुस्लिम ?

सवाल ये खड़ा होता है कि आखिर चुनाव आते ही मुस्लमान इतने अहम क्यों हो जाते हैं । दरअसल उत्तर प्रदेश में विधानसभा की 403 सीटें हैं । जिनमें से 143 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम मतदाता ज्यादा हैं. 2012 में इन 143 सीटों में से 72 सीटें समाजवादी पार्टी को मिली थीं । जबकि बीएसपी को 26, बीजेपी को 26 और कांग्रेस-आरएलडी गठबंधन को सिर्फ 14 सीटें मिली थीं । यानी सबसे ज्यादा सीटे समाजवादी पार्टी को मिली जबकि बीजेपी औप बीएसपी को 26 सीटों से संतोष करना पड़ा । और ये ही एक बड़ी वजह समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन की है । और इसी वजह से मायावती का भी डर बढ़ गया है । मायावती को लगता है कि कहीं इस बार सारा मुस्लिम वोट एसपी और कांग्रेस के इस गठबंधन की तरफ ना ट्रांस्फर हो जाए । इसीलिए मायावती अपनी हर रैली में खास तौर से मुस्लिम मतदाताओं से वोट देने की अपीलकरना नहीं भूलतीं हैं । इसीलिए मायावती ने 97 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट भी दिया है ।



बयानों के जरिये ध्रुवीकरण की कोशिश

एक तरफ समाजवादी पार्टी और मायावती मुसलमानों का रुख अपनी तरफ करने में लगी है । तो बीजेपी अपने पुराने हिन्दुत्व के एजेंडे की तरफ लौट रही है । जिसके पीछे सोच बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की है । हालांकि इसकी नींव अमित शाह ने बीजेपी के घोषणा पत्र जारी करते वक्त ही रख दी थी । शाह का पहला दांव था बाबरी विवादित ढांचा, दूसरा दांव था स्लॉटर हाउसों पर पाबंदी और तीसरा दांव था पलायन । ये तीनों वो ही मुद्दे हैं जिनके जरिये बीजेपी वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश करती रही है । अमित शाह का यूपी में मशीनि स्लॉटर हाउस बंद करने वाला बयान अपने कोर वोटर को एक संदेश था । असल में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह पिछले लोकसभा चुनाव के वक्त भी यूपी के प्रभारी महासचिव थे । उस वक्त भी बीजेपी ने विकास के एजेंडे के साथ-साथ हिंदुत्व के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था । कोशिश थी वोटों का ध्रुवीकरण । जिसमें बीजेपी कामयाब भी रही थी । एक बार फिर अमित शाह यूपी विधानसभा चुनाव में वोटों का ध्रुवीकरण कर राज्य में बीजेपी की जीत सुनिश्चित करना चाहते हैं ।

मतलब साफ है , उत्तर प्रदेश की सियासत के इस महा समर में सियासत का हर नुमाइंदा शह और मात के खेल में लगा है । कोई मुसलमानों को साधने में लगा है, तो कोई दलितों और स्वर्णों को । सियासत की इस बिसात पर शह और मात का खेल जारी है , जिसका फैसला आगामी 11 मार्च को सामने आ जाएगा ।



अमान अहमद

प्रोड्यूसर

समाचार प्लस

 

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