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हमारे समाज में वैसे तो कहने के लिए स्त्रियों को देवी का दर्जा दिया जाता है। लेकिन, इसकी जमीनी हकीकत अगर देखें तो स्थिति उतनी ही भयावह है। ये बिल्कुल वैसी ही है जैसे किसी कुरुप वस्तु को सजा-धजा कर पेश कर दिया जाता है। बनावटी अमलीजामा इतना डरावाना होता है कि खुद महिलाओं को ये यकीन होने लगता है कि वो इसी तरह के जीवन जीने के लिए पैदा हुई हैं। फिर चाहे वो पढ़ी लिखी हो या नहीं।

ये स्थिति हर वर्ग की महिलाओं को ऐसा जीवन जीने के लिए बाध्य कर देती है। आधुनिक युग की महिलाओं की स्थिति तब और दयनीय हो जाती है। जब वो खुद को पुरुषों से प्रोफेशनल लाइफ में किसी तरह से पीछे नहीं मानती। लेकिन स्वंय इस प्रश्न का सामना करने से अक्सर डरती हैं कि क्या वाकई उनकी स्थति वैसी ही है जैसा उन्हें लगता है।

हमारे समाज में महिलाओं से उम्मींद की जाती है कि वो हर हाल में मुस्कुराती रहें। वो कितनी भी थकी हुई हो लेकिन उन्हें किसी से कुछ कहने का अधिकार नहीं है। मायके में उन्हें सिखाया जाता है कि उन्हें यह सब इसलिए करना और सिखना है क्योंकि उन्हें पराये घर में जाना है। जब ससुराल आती हैं तो उन्हें ये समझाया जाता हैं कि उन्हें सारे त्याग इसलिए करने हैं क्योंकि वो दूसरे के घर से आई हैं।

आखिर क्यों बहुओं के साथ ये अत्याचार करते हुए हमें अपने घरों में बैठी अपनी मां और बहनों की याद नहीं आती। जो दर्द हमें उनके लिए होता हैं वो हमें खुद के घर आई उस बेटी के लिए क्यों नहीं होता जिसे 'बहू' बुलाया जाता है।

उसे क्यों सिर्फ एक काम करने वाली मशीन समझकर ट्रीट किया जाता है। सारे एडजस्टमेंट क्यों उसी से करवाए जाते हैं। खाना हमारी पंसद से खाओ क्योंकि हमें ऐसा पसंद है। घर से बाहर निकलने के लिए भी दूसरों की पसंद को देखना पड़ता है। इस मेहमान से बात करो, इससे मत करो क्योंकि हम ये चाहते हैं। ऐसा करने वाले लोगों से ये सवाल होना चाहिए कि औरतों को कब तक रोबोट समझा जाएगा। कब तक पति के पसंद को वो समाज की परंपरा मानकर ढोती रहेगी।

आपको बता दें कि हमारे देश में ऐसे पुरुषों की भी कमी नहीं हैं जो ये समझते हैं अगर वो अपनी पत्नी की सहयता करेंगे तो उनकी पत्नियां सदैव उनसे सहायता की उम्मीद रखने लगेगी। बावजूद इस भय के अगर वो कभी जोश में उन्हें मदद करने भी लगे तो बाकी मौजूद पुरुष उन्हें उलहाना देने से बाज नहीं आते कि वो तो अब जोरू के गुलाम बन गए हैं।

क्या वाकई वो अपनी मां के बारे में भी ऐसा ही सोचते होंगे। जब उनके पापा ने उनकी मम्मी का हाथ घर के कामों में बंटाया होगा। महिलाएं कितनी भी थकी हुई क्यों ना हो पर उन्हें कहने का हक क्यों नही दिया जाता। पुरुष क्यों उनकी सहयता नहीं कर सकते। महिलाएं ऑफिस जाकर पुरुषों का हाथ बंटा सकती हैं तो पुरुष घर में महिलाओं का हाथ क्यों नहीं बंटा सकते।

मेरा ये ब्लॉक उन सभी पुरुषों के लिए हैं जो इस तरह की मानसिकता से पीड़ित हैं। जिनके लिए महिलाएं सिर्फ दासी हैं जिन्हें स्टेटस सिंबल बनाए रखने के लिए पढ़ी लिखी बीवी तो चाहिए। लेकिन घटिया मानसिकता के चलते उन्हें कामवाली बाई से ज्यादा का दर्जा नहीं देना चाहते।

 

- मंजू शर्मा ( Web Journalist)

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